Saturday, March 19, 2011

triviahistorica: "Binjal Gagri Chhalkat Jaye!!"

triviahistorica: "Binjal Gagri Chhalkat Jaye!!"

"Binjal Gagri Chhalkat Jaye!!"

बचपन में हिंदी के कई मुहावरों से विद्यालय के मास्टरों ने पीट-पीट कर परिचय कराया था. उन्हीं  में से एक मुहावरा था  अधजल गगरी छलकत  जाए . चूँकि पिटाई के एवज में इन मुहावरों का ज्ञान प्राप्त हुआ था, स्वाभाविक  ही है कि इनके अर्थों ने उन्हीं दिनों से मेरे दिमाग में अपना स्थायी पता अंकित करवा लिया था.वो दौर कुछ और था. मुहावरों के नैतिक मूल्यों को लोग जीते थे. अपने मुह मियां  मिट्ठू बनना', अधजल गगरी छलकत जाए, तथा कई ऐसे मुहावरे थे जिनका अर्थ नकारात्मक था और लोग उस तरह के आचरण से न केवल स्वयं परहेज करते थे बल्कि अपने बाल-बच्चों को भी इनके आचरण से मीलों दूर रहने की नसीहत मुगली घुट्टी की तरह घोल-घोल कर पिलाया करते थे.अधजल गगरी छलकत जाए का अर्थ समझाया गया था कि जितना ज्ञान नहीं है उससे ज्यादा होने का दिखावा करना . जिस गगरी में पानी ( अर्थात ज्ञान )पूर्ण रूप से भरा है उसमे से पानी का छलकना स्वाभाविक है.अस्वाभाविक तो ऐसे गगरी से पानी का छलकना माना जाता था जिसमे आधा ही पानी भरा हो!!
खैर, लोग मानते हैं कि वो दौर अब बदल चुका है.अब विज्ञान और तकनीक के वैश्वीकरण के युग में लोगों को सत्कर्म करने का प्रोत्साहन स्वर्ग प्राप्ति का लोभ दिखाकर नहीं किया जा सकता.भौतिक और अध्यात्मवाद  के दंगल में अध्यात्मवाद हर गली-नुक्कड़-चौबारों में दम तोड़ता रहता है.अध्यात्म का चोला ओढ़े जो बाबा लोग चैनल बदल-बदल कर टी.वी.पर धर्म और नीति का प्रवचन देते नज़र आते हैं,पृष्टभूमि में उनके खुद का भौतिक आधार अच्छे-अच्छे औद्योगिक घरानों को शर्मिंदा कर सकता है.फिर जिनका घोषित व्यवसाय अध्यात्म नहीं है उनके लिए तो लक्ष्मीजी की कृपा अनवरत बनी रहनी चाहिए. उदारीकरण के दौर में लक्ष्मीजी भी उदार रंग में ढल चूँकि है. क्या फर्क पड़ता है उनकी सेहत पर कि उनको प्रसन्न करने के लिए लोग क़ानूनी/गैरकानूनी अथवा जायज /नाजायज तरीकों का प्रयोग करते रहे हों!! सदिओं से चली आ रही सरस्वतीजी से उनकी प्रतिस्पर्धा में पहली बार तो उन्होंने सरस्वतीजी को निर्णायक रूप से पराजित किया है.
इस बदलते परिवेश में मुहावरों के मायने भी बदलते हुए प्रतीत होते हैं. बीते दौर में कहते थे कि अपने दही को कोई खट्टा नहीं कहता है ,अर्थात  अपनी वस्तु को कोई ख़राब नहीं कहता,बल्कि ख़राब से ख़राब वस्तु को सर्व-गुण संपन्न प्रदर्शित करने की कवायद में कोई कसर नहीं छोड़ता.उस दौर में इस मुहावरे तथा इसके अर्थ को भी नकारात्मक सन्दर्भ में लिया जाता था.आज नेटवर्किंग का युग है.अपने दही को सिर्फ मीठा कहना ही प्रयाप्त नहीं है बल्कि सारी उर्जा ये घोषित करने में लगायी जाती है कि तीनों लोकों में वैसा दही मिलना दुर्लभ है.हाँ ये बात अलग है कि दावा कितना खोखला क्यों न हो बस इस दावे का नेटवर्किंग सर्वोत्तम होना चाहिए.इसी से मिलता जुलता मुहावरा है अपने मुह मियां  मिट्ठू बनना  जिसका अर्थ करीब-करीब एक ही है.मैं परेशान हूँ अधजल गगरी  वाले मुहावरे और बीते दौर में मास्टरों द्वारा रटाये गए उसके अर्थ और सन्दर्भ से.ये तो मैं मानता हूँ कि समय बदल चुका है और आज के इस नेटवर्किंग की सर्वोच्च  महत्ता वाले दौर में इस मुहावरे का सन्दर्भ पूर्ण रूप से सकारात्मक हो गया है.यहाँ तक तो ठीक है, किन्तु छलकने के लिए कम से कम आधी गगरी में जल तो होना ही चाहिए!! नेटवर्किंग के माध्यम से खाली पड़े आधी गगरी की भरपाई की जा सकती है.लेकिन भैया, यहाँ तो पूरी की पूरी गगरी खाली होती है और फिर भी सबसे ज्यादा छलकती रहती है.
जरा इन मुहावरोंं और इनके बदलते अर्थों और सन्दर्भों की बानगी श्रीमान मनमोहन सिंह की वर्तमान भारतीय सरकार के क्रिया-कलापों पर प्रत्यारोपित कर देखें.क्या इस सरकार ने अपने दही (किसी भी नीति या कर्म) को कभी भूलवश भी खट्टा कहा है?? पहले मनीष तिवारी, दिग्विजय सिंह,राजीव शुक्ला और जयंती नटराजन जैसे कांग्रेसियों को मियां मिट्ठू बनने के लिए अस्तबल से बाहर निकला जाता था और काम पूरा होने पर वापस कांग्रेसी दरबा में ठूंस दिया जाता था.कोई कमी अगर रह जाती तो कपिल सिब्बल और मणि शंकर ऐय्यर जैसे मूर्धन्य मोहरों को ये कमान सौंपी जाती थी. हद तो अब ये हो गयी कि प्रधान मंत्री साहेब खुद इस कला में इतने पारंगत हो चुके हैं कि संसद से लेकर सड़क तक मियां मिट्ठू बनने की होड़ में अगर बिनाका गीत माला जैसा कोई कार्यक्रम चल रहा होता तो उसके सर्वोच्च पायदान पर विराजमान होते.आज के किसी भी रिआलिटी शो में, जिसमे मियां मिट्ठू बनने की प्रतिस्पर्धा हो, आदरणीय प्रधान मंत्री साहेब टॉप करेंगें.
अब जरा नजर डालिए अधजल गगरी वाले मुहावरे पर.जब आरोप लगा कि सरकार बचाने के लिए इनके गुर्गों ने  संसद सदस्यों को घोड़ों की तरह खरीदने की कोशिश की तब पहले तो दोनों मुहावरों का प्रयोग कांग्रेसियों ने उन्माद के स्तर तक किया.मज़बूरी में जांच-समिति बिठानी पड़ी.समिति के विभाजित रिपोर्ट ने कहीं भी इनको  निर्णायक रूप से एकमत होकर उन आरोपों  से बरी नहीं किया. अब जब इससे सम्बंधित अमरीकी केबल का मामला सामने आया तो प्रधान मंत्री साहब का जबाब है कि वो तो चौदहवी लोकसभा की बात थी उसे पंद्रहवी लोकसभा में उठाना गलत है.साहेब ये भी कहते पाए गए हैं कि उसके बाद २००९ के चुनावों में जनता ने फैसला सुना दिया है.अब, साहेब अगर गगरी में आधा पानी भी होता तो छलकना अच्छा लग सकता था. वो खुद समझ जाते कि १४वी  लोकसभा के किसी कुकृत्य की जांच १५वी लोकसभा में क्यों नहीं हो सकती जब  उसी मुद्दे से सम्बंधित नयी सूचनाएं(सही या गलत किसी निष्पक्ष जांच की विषय-वस्तु है) सामने आ रही हों.गगरी में आधा पानी का एहसास तब भी हुआ होता जब आदरणीय प्रधान-मंत्री साहेब कम से कम ये न कहते कि उसका फैसला जनता ने २००९ के चुनावों में कर दिया.अब मैं तो ठहरा निरा मुर्ख,देहाती,अनपढ़ और गवार, शायद संविधान में ऐसा कोई संशोधन हुआ हो कि अब से भ्रष्टाचार के किसी भी आरोप की जांच के लिए जांच समिति का गठन करने की आवश्यकता नहीं है, जनता ही फैसला सुनाएगी.
इस मौके पर एक और मुहावरा याद आ रहा है हाथ कंगन को आरसी क्या ? अगर दमन बेदाग हैं तो सच सामने आ ही जायेगा फिर सार्वजनिक जीवन में आरोपों से डरना कैसा??लेकिन समस्या ये है कि सकारात्मक मायने वाला ये मुहावरा नेटवर्किंग की आपाधापी में सटीक नहीं भान पड़ता.जहाँ होड़ लगी हो पानी को दूध साबित करने की वहां दूध का दूध और पानी का पानी अलग  कैसे हो सकता है?? अतेव मुझे लगता है कि समय आ गया है कि अधजल गगरी छलकत जाए मुहावरे में समयानुकूल परिवर्तन की आवश्यकता है और सभी व्यवहार और प्रयोग में इसका रूपांतरण बिनजल गगरी छलकत जाए में होना चाहिए.:))