Tuesday, May 10, 2011

Did You Know??

1971 was an important year which witnessed an Intense Indo-Pak War over the status of East Pakistan. The then Indian Prime Minister late Lal Bahadur Shastri Invoked the Slogan ''Jai Jawan Jai Kisan'' to inspire the morale of the Indian Army.Our Very Own Bollywood Produced Two Films- Jai Bangladesh and Jai Jawan Jai Makan more or less sounding strange but some sort of similarity around the theme!!!

Saturday, March 19, 2011

triviahistorica: "Binjal Gagri Chhalkat Jaye!!"

triviahistorica: "Binjal Gagri Chhalkat Jaye!!"

"Binjal Gagri Chhalkat Jaye!!"

बचपन में हिंदी के कई मुहावरों से विद्यालय के मास्टरों ने पीट-पीट कर परिचय कराया था. उन्हीं  में से एक मुहावरा था  अधजल गगरी छलकत  जाए . चूँकि पिटाई के एवज में इन मुहावरों का ज्ञान प्राप्त हुआ था, स्वाभाविक  ही है कि इनके अर्थों ने उन्हीं दिनों से मेरे दिमाग में अपना स्थायी पता अंकित करवा लिया था.वो दौर कुछ और था. मुहावरों के नैतिक मूल्यों को लोग जीते थे. अपने मुह मियां  मिट्ठू बनना', अधजल गगरी छलकत जाए, तथा कई ऐसे मुहावरे थे जिनका अर्थ नकारात्मक था और लोग उस तरह के आचरण से न केवल स्वयं परहेज करते थे बल्कि अपने बाल-बच्चों को भी इनके आचरण से मीलों दूर रहने की नसीहत मुगली घुट्टी की तरह घोल-घोल कर पिलाया करते थे.अधजल गगरी छलकत जाए का अर्थ समझाया गया था कि जितना ज्ञान नहीं है उससे ज्यादा होने का दिखावा करना . जिस गगरी में पानी ( अर्थात ज्ञान )पूर्ण रूप से भरा है उसमे से पानी का छलकना स्वाभाविक है.अस्वाभाविक तो ऐसे गगरी से पानी का छलकना माना जाता था जिसमे आधा ही पानी भरा हो!!
खैर, लोग मानते हैं कि वो दौर अब बदल चुका है.अब विज्ञान और तकनीक के वैश्वीकरण के युग में लोगों को सत्कर्म करने का प्रोत्साहन स्वर्ग प्राप्ति का लोभ दिखाकर नहीं किया जा सकता.भौतिक और अध्यात्मवाद  के दंगल में अध्यात्मवाद हर गली-नुक्कड़-चौबारों में दम तोड़ता रहता है.अध्यात्म का चोला ओढ़े जो बाबा लोग चैनल बदल-बदल कर टी.वी.पर धर्म और नीति का प्रवचन देते नज़र आते हैं,पृष्टभूमि में उनके खुद का भौतिक आधार अच्छे-अच्छे औद्योगिक घरानों को शर्मिंदा कर सकता है.फिर जिनका घोषित व्यवसाय अध्यात्म नहीं है उनके लिए तो लक्ष्मीजी की कृपा अनवरत बनी रहनी चाहिए. उदारीकरण के दौर में लक्ष्मीजी भी उदार रंग में ढल चूँकि है. क्या फर्क पड़ता है उनकी सेहत पर कि उनको प्रसन्न करने के लिए लोग क़ानूनी/गैरकानूनी अथवा जायज /नाजायज तरीकों का प्रयोग करते रहे हों!! सदिओं से चली आ रही सरस्वतीजी से उनकी प्रतिस्पर्धा में पहली बार तो उन्होंने सरस्वतीजी को निर्णायक रूप से पराजित किया है.
इस बदलते परिवेश में मुहावरों के मायने भी बदलते हुए प्रतीत होते हैं. बीते दौर में कहते थे कि अपने दही को कोई खट्टा नहीं कहता है ,अर्थात  अपनी वस्तु को कोई ख़राब नहीं कहता,बल्कि ख़राब से ख़राब वस्तु को सर्व-गुण संपन्न प्रदर्शित करने की कवायद में कोई कसर नहीं छोड़ता.उस दौर में इस मुहावरे तथा इसके अर्थ को भी नकारात्मक सन्दर्भ में लिया जाता था.आज नेटवर्किंग का युग है.अपने दही को सिर्फ मीठा कहना ही प्रयाप्त नहीं है बल्कि सारी उर्जा ये घोषित करने में लगायी जाती है कि तीनों लोकों में वैसा दही मिलना दुर्लभ है.हाँ ये बात अलग है कि दावा कितना खोखला क्यों न हो बस इस दावे का नेटवर्किंग सर्वोत्तम होना चाहिए.इसी से मिलता जुलता मुहावरा है अपने मुह मियां  मिट्ठू बनना  जिसका अर्थ करीब-करीब एक ही है.मैं परेशान हूँ अधजल गगरी  वाले मुहावरे और बीते दौर में मास्टरों द्वारा रटाये गए उसके अर्थ और सन्दर्भ से.ये तो मैं मानता हूँ कि समय बदल चुका है और आज के इस नेटवर्किंग की सर्वोच्च  महत्ता वाले दौर में इस मुहावरे का सन्दर्भ पूर्ण रूप से सकारात्मक हो गया है.यहाँ तक तो ठीक है, किन्तु छलकने के लिए कम से कम आधी गगरी में जल तो होना ही चाहिए!! नेटवर्किंग के माध्यम से खाली पड़े आधी गगरी की भरपाई की जा सकती है.लेकिन भैया, यहाँ तो पूरी की पूरी गगरी खाली होती है और फिर भी सबसे ज्यादा छलकती रहती है.
जरा इन मुहावरोंं और इनके बदलते अर्थों और सन्दर्भों की बानगी श्रीमान मनमोहन सिंह की वर्तमान भारतीय सरकार के क्रिया-कलापों पर प्रत्यारोपित कर देखें.क्या इस सरकार ने अपने दही (किसी भी नीति या कर्म) को कभी भूलवश भी खट्टा कहा है?? पहले मनीष तिवारी, दिग्विजय सिंह,राजीव शुक्ला और जयंती नटराजन जैसे कांग्रेसियों को मियां मिट्ठू बनने के लिए अस्तबल से बाहर निकला जाता था और काम पूरा होने पर वापस कांग्रेसी दरबा में ठूंस दिया जाता था.कोई कमी अगर रह जाती तो कपिल सिब्बल और मणि शंकर ऐय्यर जैसे मूर्धन्य मोहरों को ये कमान सौंपी जाती थी. हद तो अब ये हो गयी कि प्रधान मंत्री साहेब खुद इस कला में इतने पारंगत हो चुके हैं कि संसद से लेकर सड़क तक मियां मिट्ठू बनने की होड़ में अगर बिनाका गीत माला जैसा कोई कार्यक्रम चल रहा होता तो उसके सर्वोच्च पायदान पर विराजमान होते.आज के किसी भी रिआलिटी शो में, जिसमे मियां मिट्ठू बनने की प्रतिस्पर्धा हो, आदरणीय प्रधान मंत्री साहेब टॉप करेंगें.
अब जरा नजर डालिए अधजल गगरी वाले मुहावरे पर.जब आरोप लगा कि सरकार बचाने के लिए इनके गुर्गों ने  संसद सदस्यों को घोड़ों की तरह खरीदने की कोशिश की तब पहले तो दोनों मुहावरों का प्रयोग कांग्रेसियों ने उन्माद के स्तर तक किया.मज़बूरी में जांच-समिति बिठानी पड़ी.समिति के विभाजित रिपोर्ट ने कहीं भी इनको  निर्णायक रूप से एकमत होकर उन आरोपों  से बरी नहीं किया. अब जब इससे सम्बंधित अमरीकी केबल का मामला सामने आया तो प्रधान मंत्री साहब का जबाब है कि वो तो चौदहवी लोकसभा की बात थी उसे पंद्रहवी लोकसभा में उठाना गलत है.साहेब ये भी कहते पाए गए हैं कि उसके बाद २००९ के चुनावों में जनता ने फैसला सुना दिया है.अब, साहेब अगर गगरी में आधा पानी भी होता तो छलकना अच्छा लग सकता था. वो खुद समझ जाते कि १४वी  लोकसभा के किसी कुकृत्य की जांच १५वी लोकसभा में क्यों नहीं हो सकती जब  उसी मुद्दे से सम्बंधित नयी सूचनाएं(सही या गलत किसी निष्पक्ष जांच की विषय-वस्तु है) सामने आ रही हों.गगरी में आधा पानी का एहसास तब भी हुआ होता जब आदरणीय प्रधान-मंत्री साहेब कम से कम ये न कहते कि उसका फैसला जनता ने २००९ के चुनावों में कर दिया.अब मैं तो ठहरा निरा मुर्ख,देहाती,अनपढ़ और गवार, शायद संविधान में ऐसा कोई संशोधन हुआ हो कि अब से भ्रष्टाचार के किसी भी आरोप की जांच के लिए जांच समिति का गठन करने की आवश्यकता नहीं है, जनता ही फैसला सुनाएगी.
इस मौके पर एक और मुहावरा याद आ रहा है हाथ कंगन को आरसी क्या ? अगर दमन बेदाग हैं तो सच सामने आ ही जायेगा फिर सार्वजनिक जीवन में आरोपों से डरना कैसा??लेकिन समस्या ये है कि सकारात्मक मायने वाला ये मुहावरा नेटवर्किंग की आपाधापी में सटीक नहीं भान पड़ता.जहाँ होड़ लगी हो पानी को दूध साबित करने की वहां दूध का दूध और पानी का पानी अलग  कैसे हो सकता है?? अतेव मुझे लगता है कि समय आ गया है कि अधजल गगरी छलकत जाए मुहावरे में समयानुकूल परिवर्तन की आवश्यकता है और सभी व्यवहार और प्रयोग में इसका रूपांतरण बिनजल गगरी छलकत जाए में होना चाहिए.:))

Sunday, February 27, 2011

Pushp Ki Abhilasha (Samprati) !!

हिंदी साहित्य की समृद्धि में अपना अंशदान करने वाले अनेकोनेक मूर्धन्य विभूतियों में कविवर माखन लाल चतुर्वेदी का नाम अग्रिम सूचि में शामिल है. शब्दों की लयात्मक माला का सुघड़ स्वरुप और ओजस्वी वीर रस युक्त देश प्रेम की अविरल धारा का जो प्रवाह उनकी अत्यधिक प्रसिद्ध रचना पुष्प की अभिलाषा  में दिखाई पड़ता है वह उपरोक्त सन्दर्भ में उनके नाम की सार्थकता को स्वतः प्रमाणित करता है. पुष्प में अन्तर्निहित सौंदर्य बोध के मोह- पाश में न उलझकर उसकी उपयोगिता के भाव पक्षों में तात्कालिक  मानवीय मूल्यांकन की दृष्टि से श्रेष्ठ, देश-प्रेम के भाव को शीर्षता प्रदान कर उन्होंने अपनी कविता को अति उच्च धरातल पर प्रस्तुत किया है. कवि की वैचारिक निष्ठा और देश प्रेम के प्रति ईमानदारी के सम्प्रेषण का माध्यम पुष्प बन जाता है जो अन्यथा इन भावों से स्वतः पूर्ण रूप से मुक्त है. कवि की अपनी मातृभूमि के प्रति प्रेम और प्रतिबद्धता पुष्प को अभिभूत करता है कि वह कवि के भावों का संवहन करे तथा इस प्रक्रिया में वह स्वयं मानवीय स्वरुप धारण कर लेता है. माना जा सकता है कि वह दौर ही कुछ ऐसा था जब देशप्रेम एक पूर्णकालिक पेशा था और मानवीय जीवन की सभी भौतिक वरीयताओं, चिंताओं और जुगतों से इतर सदैव अपनी प्राथमिकता और अनिवार्यता तात्कालिक मानसिक पटल पर बनाये रखता था. मानवीय भावनाओं के प्रतीकात्मक चित्रण की सरलता, सहजता और सुन्दरता का घनिष्ट सम्बन्ध निश्चित रूप से वैचारिक एकात्मकता के साथ प्रत्यक्ष रूप से सामंजस्य और तारतम्यता स्थापित कर पाने की उस पीढ़ी की सफलता में निहित है.
                                                  सम्प्रति, मानवीय संवेदनाएं तथा उनका गद्यात्मक अथवा पद्यात्मक सम्प्रेषण की यात्रा  अबाध गति से आगे बढ़ रही है और नित नए मंजिल तलाश रही है. बदलते परिवेश में शायद पुष्प की अभिलाषाएं भी बदल रही हैं. वरीयता क्रम में आज किसी सजनी के सौंदर्य वृद्धि में शामिल होना सर्वोपरि हो. उदारीकरण और बाजारवाद के इस दौर में सजनी का स्वरुप भी उदात्त, उदार और बाजारू हो गया है.आज सजनी पत्र-पत्रिकाओं और दूर संचार के सभी माध्यमों में बार बार तथा दिन प्रति दिन इतनी बार अपनी उदारीकृत स्वरुप में अवतरित होती हैं कि अगरबत्ती से लेकर तम्बाकू तक का सेवन करने वाले लोगों के मनह-पटल पर अमिट रूप से बसी होती हैं. ज़ाहिर है, सजनी कि मांग बढ़ी है इस दौर में: उठते- बैठते,सोते-जागते सजनी की भाव-भंगिमाओं के दर्शन कराये और किये जाते हैं. घर में अपनी सजनी अगर हो भी तब भी
 परायी सजनी के सौंदर्य का बाजारी स्वरुप का खुले तौर पर चक्षु- पान करने के अवसर बगैर कोई परिश्रम के   मिलता रहे तो कोई भी "चौहान" क्यूँ चूकेगा? बाजार सजी है कवियों की भी तथा बेचनी है अपनी कविताओं को तो अपनी कविताओं में पुष्पों की माला गूंधते  समय सजनी और उसके वैश्विक बाजार को आज का कवि कैसे नज़रंदाज़ कर सकता है? आज सजनी के जिस '' सौंदर्य- पुराण'' की रचना वह करता है, उसकी पुष्प  की अभिलाषा उसी पुराण में गुंधे जाने की होती है. सजनी की सुन्दरता को प्रतीकात्मक रूप से चित्रित करने के उद्यम में पुष्प से बेहतर और कोई प्रतीक हो भी नहीं सकता.
                                                         रही बात उस पथ पर फेंक दिए जाने की जिस रास्ते पर मातरी -भूमि पर अपना जीवन उत्सर्ग करने वीर जाते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि आज के इस दौर में न तो ऐसा कोई पथ दिखाई पड़ता है, और  न ही ऐसा कोई जुनूनी वीर!! अब तो पुष्प वनों में कम और पूंजीवादी बगीचों में ज्यादा खिलते हैं. वनमाली भी कहाँ नज़र आतें हैं? हाँ, पुष्प की भौतिक मूर्त सुन्दरता का मौद्रिक नीलामी लगाने वाले फ्लोरिस्ट नज़र आते हैं सभी पूंजीवादी चौराहों और नुक्कड़ों पर. आर्थिक उदारीकरण ने राष्ट्र की दहलीज़ को लांघ कर सम्पूर्ण विश्व को एक वैश्विक गाँव में परिवर्तित  करने का बीड़ा उठा रक्खा  है तो प्रेम भी राष्ट्र की सीमा को लांघ कर उस एक वैश्विक गाँव के प्रति होना स्वाभाविक हो गया है.
                                                         अतएव, चतुर्वेदी जी, आपकी सोच और आपका देशप्रेम हमारे इतिहास औरसाहित्य की परम्पराओं में स्वर्णिम अक्षरों में उत्कीर्ण हैं. किन्तु, उनकी प्रासंगिकता इस दौर में बदल चुके परिवेश की वजह से शून्य हो चुकी है.हमने ये मान लिया है कि हमें राष्ट्र-प्रेम के आपके दौर के उन्माद तथा जुनून कि आवश्यकता अंग्रेजों से सिर्फ अपनी राजनीतिक आज़ादी प्राप्त करने के लिए थी.सो हमने प्राप्त कर ली. अब तो स्वशासन है.पुष्प की कीमतें आसमान छूतीं  हैं, वनमाली भी नज़र नहीं आता, स्वशासन में जीवन का बलिदान भी किसके विरोध में करें. कुल मिलाकर, अब पुष्प कि वर्तमान अभिलाषा यही प्रतीत होती  है कि वह बाजारी सजनी की  अंगिका बनी रहे!!!                                                  संजय सिंह.                                                                                      

Tuesday, February 8, 2011

Mantri Ji Ke Ghar Shaadi !!!

न्यायाधीश महोदय की गाड़ी द्रुत गति से सड़क पर दौड़ रही थी. अँधेरा हो चला था और महोदय को जल्दी थी. मंत्रीजी के यहाँ उनके दूर के किसी रिश्तेदार  के पुत्र की शादी थी और इन्हें वहां पहुंचना था.अब न्यायाधीश हैं तो समय के पाबंद तो होंगे हीं. दरअसल न्यायालय के मुखिया हैं और कीड़े मकोड़ों की तरह रहने वालों आम लोगों के मुक़दमों का निपटारा करते-करते शाम तक थक जातें हैं और दिमाग झल्ला उठता है. अपनी शक्ति और पहुँच का नशा भी है. जब कोर्ट में दाखिल होते हैं तो उनके सम्मान में सभी उपस्थित लोग खड़े होकर उनका अभिवादन करते हैं और दिन भर अदालत में वो भगवान बने रहते हैं. उनकी कलम से निकलने वाले फैसले मरने वालों को जिंदगी देतें हैं और हट्टे-कट्टे स्वस्थ को मौत दे सकते हैं. ऊपर वाले भगवान को तो किसी ने नहीं देखा किन्तु मनुष्य के रूप में पृथ्वी पर अवतरित भगवानों की कुछ श्रेणियों में इनका भी तो शुमार होता है.

एकाएक एक झटका सा लगा और उनकी तन्द्रा भंग हो गयी. ड्राईवर से  पूछने पर पता चला कि अचानक गाड़ी के सामने कोई आ गया और उसे टक्कर लग गयी. न्यायाधीश महोदय ने फैसला सुनाया और वो भी चंद  सेकंड्स में. मिनिस्टर साहब के यहाँ समय से पहुंचना ज्यादा जरुरी है.ये लोग तो बिना आवश्यकता या उद्देश्य के पैदा होतें हैं और जिंदगी भर एड़ियां रगड़-रगड़ कर जीतें हैं और अंत में ऐसे ही गुमनामी की मौत मर जातें हैं. इसे अस्पताल पहुचाने से व्यर्थ देरी होगी और वैसे भी इस जैसे जाहिल गंवार के लिए मंत्री जी को किसी भी हालत में नाराज़ नहीं किया जा सकता. गाड़ी समय नष्ट किये बिना फिर से द्रुत गति से आगे बढ़ गयी और घायल व्यक्ति की चीख-पुकार न्यायाधीश महोदय के कानों पर धीमी पड़ती चली गयीं.

इलाका सुनसान था. इक्का-दुक्का गाड़ियाँ ही उधर से गुजरने वाली थीं. चूँकि मंत्री महोदय के यहाँ शादी हो रही थी तो यातायात पुलिस का मौलिक कर्त्तव्य था कि आतंकवादी हमले का अंदेशा जता कर पुरे इलाके को आम आदमियों के लिए बंद कर दिया जाता और इस बार भी वो  अपने इस मौलिक कर्त्तव्य का निर्वहन पूरी निष्ठा और ईमानदारी  से कर रही थी. सन्दर्भ ये है कि उस घायल व्यक्ति क़ी चीख पुकार सुनने के लिए अगली गाड़ी का आना निहायत जरुरी था.

जल्द ही अगली गाड़ी हवा से बातें करती हुई वहां पहुंची . इस गाड़ी में शहर के पुलिस प्रधान विराजमान थे. ज्यों-ज्यों गाड़ी नजदीक आती गयी, घायल व्यक्ति क़ी दर्दनाक चीखों क़ी आवाज़ स्पष्ट सुनाई पड़ने लगी. ड्राईवर ने साहब को दुर्घटना के बारे में सूचित किया. साहब की समस्या भी वही थी. मंत्री जी का आशीर्वाद अपने पद पर बने रहने के लिए अनिवार्य था. बड़ी मुश्किल से, अथक परिश्रम और जायज-नाजायज हर तरीकों  का प्रयोग कर, मंत्रीजी को प्रसन्न किया था उन्होंने और इस मलाईदार पद पर आसीन होने  का सौभाग्य प्राप्त किया था. शहर में दबी जुबान ये चर्चा आम थी कि एकमुश्त एक बड़ी रकम उन्हें मंत्री जी को देना पड़ा था और साथ ही यह जुबान भी कि पूर्ण मासिक ऊपरी कमाई का एक बड़ा हिस्सा नजराने के तौर पर हर महीने मंत्री जी के किसी गोपनीय खाते में जमा कराएँगे. देरी से वहां पहुँचने का मतलब था मंत्रीजी का रुष्ट होना और उनकी पोस्टिंग दूर-दराज के किसी देहाती इलाके में होना. उन्होंने भी कुछ सेकंड्स ही लगाये और निर्णय लिया कि कोई न कोई भलमानस पीछे से आता ही होगा जो उनकी तरह 'मजबूर' नहीं होगा और शायद इस व्यक्ति की जान बच जाये. अगर वो मर भी जाता है तो कोई बड़ी बात तो होगी नहीं. बड़े-बड़े शहरों में छोटी छोटी बातें तो होती ही रहती हैं. शाहरुख़ खान के इस फ़िल्मी उक्ति को उन्होंने अपनी नैतिकता का आधार बनाया . उनके इशारे पर गाड़ी एक बार फिर हवा से बातें करने लगी और चीख-पुकार पीछे छूटता चला गया.

 दनदनाती हुई आती अगली गाड़ी में जिलाधिकारी महोदय सवार थे. कहने की ज़रूरत भी नहीं शायद कि बड़े-बड़े पापड़ बेलने पड़े थे उन्हें  इस शहर तक पहुँचने के लिए. देहाती इलाके में बरसों घुटने के बाद उन्हें ये मौका कुछ उन्ही तरीकों को आजमाने के बाद मिला था जिनके माध्यम से पुलिस प्रमुख ने अपना पद प्राप्त किया था. भारतीय प्रशासनिक सेवा का कठिन इम्तिहान  उन्होंने गाँव का धुल फांकने के लिए तो नहीं पास किया था. आखिर उनका भी करियर का प्रश्न था जो पहले ही कई बरस गाँव की रेतीली पगडंडियों में जाया हो चुकी थी. मंत्रीजी को रुष्ट करना और उनके कोपभाजन का शिकार होना कैसे गवारा करते? गाड़ी उसी तरह दनदनाती निकल गयी जैसे वहां आई थी, मानो वहां कुछ भी तो नहीं हुआ था.

मंत्रीजी के घर शादी हो और शहर के सबसे प्रतिष्ठित दैनिक के संपादक महोदय वहां उपस्थित गणमान्यों में अपनी उपस्थिति दर्ज न कराएँ, ये भला कैसे संभव था? बड़ी सी चमचमाती गाड़ी अपने गंतब्य की तरफ तीव्रता से अग्रसर थी. आज उन्होंने मन में ठान रक्खा था कि चौबीस घंटे का एक फैशन चैनल का लाईसेंस  इस ख़ुशी के मौके पर मंत्री जी के प्रसन्नता का लाभ उठाकर प्राप्त कर ही लेंगे. उनका चौबीस घंटे का न्यूज़ चैनल शहर में पहले से ही सभी टी.आर.पी रेंकिंग में शीर्ष पर विराजमान था . लक्ष्मी जी की कृपा उनपर इस तरह से हो रही थी मानो लक्ष्मी जी को उस शहर का पहला एड्रेस उन्ही का पता हो. फिर भी मन में लालसा थी कि कुछ सरकारी विज्ञापन और मिल जाते तो उनके और वारे न्यारे हो जाते. उसी जुगत में लीन थे जब कानो में दर्द भरी चीत्कार सुनाई पड़ी. लेकिन जिस सोच में वो तल्लीन थे उन्हें ये राग इतना बेसुरा लगा कि  ड्राईवर को गाड़ी इतना तेज भागने को कहा, मानो अचानक सैकड़ो भूत उनकी गाड़ी के पीछे लग गए हों.

सदन में विरोधी दल के नेता सदन के अन्दर और बाहर जबतक मंत्री जी तथा उनकी सरकार की भूरी-भूरी आलोचना नहीं कर लेते, तबतक उनकी राजनीति और राजधर्म पूरा नहीं होता था. किसी दिन अगर कोई कमी रह जाती तो सुबह-सुबह उनका पेट साफ़ नहीं होताऔर दिन भर गैस के गोले बनते रहते थे. लेकिन ये तो थी उनकी राजधर्म की बातें जो उनकी घोषित नीति के अनुसार 'मुद्दों' पर आधारित आलोचनाएँ हुआ करती थीं. व्यक्तिगत सम्बन्ध का मामला अलग था. वो मानते थे कि आदर्श राजनीति में मुद्दों का विरोध होता हैं न कि व्यक्तियों का . इस सिद्धांत के आवरण के नीचे कुछ व्यवहारिक समस्याएं भी थीं. उनकी पार्टी को सत्ता से बाहर हुए एक ज़माना बीत चुका था. पिछले तीन चुनावों में मंत्री जी की पार्टी से उनकी पार्टी को कड़ा चुनावी जबाब मिला था. सत्ता से इतने अरसे तक दूर रहने का एक स्वाभाविक परिणाम ये हुआ कि अब सरकारी दफ्तरों में चपरासी तक  इनका काम करने से कतराते थे . अपना काम करवाने के लिए उन्हें मंत्री जी की सहृदयता पर आश्रित रहना पड़ता था. ऊपर से मंत्री जी ने किसी बाजारू महिला के साथ रतिग्रस्त अवस्था में इनका स्टिंग करवा कर उस रेकॉर्डिंग को अपने गोपनीय खाते में बंद कर रक्खा था . इन महाशय की राजनितिक हिमाकत जब ज्यादा बढ़ जाती तो मंत्री जी को याद दिलाना पड़ता था, और ये महाशय होश में आ जाते थे. अब आप ही बताईये कि इनके कानों तक सड़क पर किसी दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति  की चीख पुकार क्यों कर पहुंचेगी? आनन्- फानन में उनकी गाड़ी आई और फुर्र से निकल गयी. जानने की भी ज़हमत नहीं उठाई कि माजरा क्या था?

गाड़ियों का काफिला यहीं समाप्त हो गया. रात भर शादी का जश्न चलता रहा. ऊपर से हर उपस्थित व्यक्ति खुश दिखाई पड़ने का गंभीर प्रयास करता दिख रहा था और अन्दर ही अन्दर मौके तलाशता कि कब मंत्री जी की नज़र उनपर पड़े, उनकी उपस्थिति  भलीभांति दर्ज हों और कैसे उनके हित सध सकें? दूसरी और घायल व्यक्ति  की हालत बिगडती जा रही थी. रात भर बुरी तरह से लहूलुहान अवस्था में कराहता रहा लेकिन उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं मिला. हाँ, पौ फटने के बाद एक बैलगाड़ी वाला उधर से गुजर रहा था. चूँकि आतंकवादी हमले का अंदेशा टल चुका था, अतः अब उस मार्ग से गुजरने पर से प्रतिबन्ध को हटा लिया गया था. बैलगाड़ी वाले ने उसे उठाकर पानी पिलाया और अब अपनी बैलगाड़ी में डालकर सरकारी अस्पताल ले जा रहा है. घायल व्यक्ति अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है. और हाँ, उसने अभी-अभी अपना नाम भी बताया. उसने बताया कि लोग उसे प्रजातंत्र के नाम से पुकारते हैं.गाडी धीरे-धीरे चल रही है और प्रजातंत्र अपनी अंतिम सांसे गिन रहा है,.पता नहीं अस्पताल पहुँच कर स्वस्थ हो पायेगा फिर से या रस्ते में ही दम तोड़ देगा!!    

Sunday, February 6, 2011

The American Identity, Democracy and the State..



America practices near perfect democracy for its own territories. This democratic set up has been weaved around the grand notion of infallibility of the American Identity. Every American, irrespective of  his or her class, race, religion, gender and linguist affiliations, takes immense pride of  his or her national identity. He is trained that way by the American constitution which empowers  him or her with individual rights and privileges, by and large, based on egalitarian principles. The American legislative, executive and judicial institutions further affirm his or her belief  in the fairness of  its democratic fabric by virtue of  more or less egalitarian ways of  functioning. One unknown investigative officer, Kenneth Star, could investigate and pronounced  the then president of  America, Bill Clinton, guilty in the infamous Monica Lewinsky case, speaks volumes to the strength of  the functioning and deliverance of  the American system. The  popular American information mediums such as journalism, literature, cinema etc., take absolute care while dealing with issues involving the American Identity. These mediums  never show the American state, policies or events in negative light. Instead these seek every opportunity to glorify and rather eugolize the pride of every American citizen behind the national identity. Thus, huge mass of  the American citizens assembling voluntarily to remove the debris of  the Twin Tower, post terror strike, or the voluntary self censorship of the American media  not to show the American blood  sprints sprayed over the terror hit area further attest to the infallibility of the American identity for every American citizen. Instances and examples of  the infallibility of the American identity simply gets multiplied if probed further deeper.

The American citizens, so trained, actually take immense pride in his or her American identity. The sub- identities- that of race, religion, community or linguist affiliations could voluntarily be put on hold if  these come to compete with the national identity. The state also does not differentiate amongst its citizens on these lines in matters of rights and privileges. This, in turn, also makes them responsible to contribute to the overall growth of their nation, in whatever capacities they pursue their professional lives. Such inspirations work wonders for the American work culture. One hardly needs to sermonize an average American citizen to be uprightly honest towards the work he or she pursues.

 America bashing may be a popular political and intellectual theme in other parts of the world and particularly in India. But the bashing lacks credibility. Hardly any part of the world , with India included in its ambit , pays attention to the national identity so much so as the Americans do. The divisionary components such as class, caste, religion, gender and linguist affiliations rather prevents the formation of  the pan nationalist identity. These divisions fiercely compete each other within the overall conceptually existing idea and identity of state in most of other parts of the world, which call themselves democracies. Needless to say these sub-identities prevail upon the national identity  in matters of  securing rights and privileges for the respective sub-identities exclusively. And the issue of national identity becomes easily fallible. With it also comes unaccountability towards the nation, and dishonest work culture as premiums. India is one leading example in the reverse order
of it. Learn from the American democracy for its people and if at all we need to copy Americans, it may be their total surrender to the national identity bringing in sincerity and commitment of the American state towards its citizens and the vice versa.