न्यायाधीश महोदय की गाड़ी द्रुत गति से सड़क पर दौड़ रही थी. अँधेरा हो चला था और महोदय को जल्दी थी. मंत्रीजी के यहाँ उनके दूर के किसी रिश्तेदार के पुत्र की शादी थी और इन्हें वहां पहुंचना था.अब न्यायाधीश हैं तो समय के पाबंद तो होंगे हीं. दरअसल न्यायालय के मुखिया हैं और कीड़े मकोड़ों की तरह रहने वालों आम लोगों के मुक़दमों का निपटारा करते-करते शाम तक थक जातें हैं और दिमाग झल्ला उठता है. अपनी शक्ति और पहुँच का नशा भी है. जब कोर्ट में दाखिल होते हैं तो उनके सम्मान में सभी उपस्थित लोग खड़े होकर उनका अभिवादन करते हैं और दिन भर अदालत में वो भगवान बने रहते हैं. उनकी कलम से निकलने वाले फैसले मरने वालों को जिंदगी देतें हैं और हट्टे-कट्टे स्वस्थ को मौत दे सकते हैं. ऊपर वाले भगवान को तो किसी ने नहीं देखा किन्तु मनुष्य के रूप में पृथ्वी पर अवतरित भगवानों की कुछ श्रेणियों में इनका भी तो शुमार होता है.
एकाएक एक झटका सा लगा और उनकी तन्द्रा भंग हो गयी. ड्राईवर से पूछने पर पता चला कि अचानक गाड़ी के सामने कोई आ गया और उसे टक्कर लग गयी. न्यायाधीश महोदय ने फैसला सुनाया और वो भी चंद सेकंड्स में. मिनिस्टर साहब के यहाँ समय से पहुंचना ज्यादा जरुरी है.ये लोग तो बिना आवश्यकता या उद्देश्य के पैदा होतें हैं और जिंदगी भर एड़ियां रगड़-रगड़ कर जीतें हैं और अंत में ऐसे ही गुमनामी की मौत मर जातें हैं. इसे अस्पताल पहुचाने से व्यर्थ देरी होगी और वैसे भी इस जैसे जाहिल गंवार के लिए मंत्री जी को किसी भी हालत में नाराज़ नहीं किया जा सकता. गाड़ी समय नष्ट किये बिना फिर से द्रुत गति से आगे बढ़ गयी और घायल व्यक्ति की चीख-पुकार न्यायाधीश महोदय के कानों पर धीमी पड़ती चली गयीं.
इलाका सुनसान था. इक्का-दुक्का गाड़ियाँ ही उधर से गुजरने वाली थीं. चूँकि मंत्री महोदय के यहाँ शादी हो रही थी तो यातायात पुलिस का मौलिक कर्त्तव्य था कि आतंकवादी हमले का अंदेशा जता कर पुरे इलाके को आम आदमियों के लिए बंद कर दिया जाता और इस बार भी वो अपने इस मौलिक कर्त्तव्य का निर्वहन पूरी निष्ठा और ईमानदारी से कर रही थी. सन्दर्भ ये है कि उस घायल व्यक्ति क़ी चीख पुकार सुनने के लिए अगली गाड़ी का आना निहायत जरुरी था.
जल्द ही अगली गाड़ी हवा से बातें करती हुई वहां पहुंची . इस गाड़ी में शहर के पुलिस प्रधान विराजमान थे. ज्यों-ज्यों गाड़ी नजदीक आती गयी, घायल व्यक्ति क़ी दर्दनाक चीखों क़ी आवाज़ स्पष्ट सुनाई पड़ने लगी. ड्राईवर ने साहब को दुर्घटना के बारे में सूचित किया. साहब की समस्या भी वही थी. मंत्री जी का आशीर्वाद अपने पद पर बने रहने के लिए अनिवार्य था. बड़ी मुश्किल से, अथक परिश्रम और जायज-नाजायज हर तरीकों का प्रयोग कर, मंत्रीजी को प्रसन्न किया था उन्होंने और इस मलाईदार पद पर आसीन होने का सौभाग्य प्राप्त किया था. शहर में दबी जुबान ये चर्चा आम थी कि एकमुश्त एक बड़ी रकम उन्हें मंत्री जी को देना पड़ा था और साथ ही यह जुबान भी कि पूर्ण मासिक ऊपरी कमाई का एक बड़ा हिस्सा नजराने के तौर पर हर महीने मंत्री जी के किसी गोपनीय खाते में जमा कराएँगे. देरी से वहां पहुँचने का मतलब था मंत्रीजी का रुष्ट होना और उनकी पोस्टिंग दूर-दराज के किसी देहाती इलाके में होना. उन्होंने भी कुछ सेकंड्स ही लगाये और निर्णय लिया कि कोई न कोई भलमानस पीछे से आता ही होगा जो उनकी तरह 'मजबूर' नहीं होगा और शायद इस व्यक्ति की जान बच जाये. अगर वो मर भी जाता है तो कोई बड़ी बात तो होगी नहीं. बड़े-बड़े शहरों में छोटी छोटी बातें तो होती ही रहती हैं. शाहरुख़ खान के इस फ़िल्मी उक्ति को उन्होंने अपनी नैतिकता का आधार बनाया . उनके इशारे पर गाड़ी एक बार फिर हवा से बातें करने लगी और चीख-पुकार पीछे छूटता चला गया.
दनदनाती हुई आती अगली गाड़ी में जिलाधिकारी महोदय सवार थे. कहने की ज़रूरत भी नहीं शायद कि बड़े-बड़े पापड़ बेलने पड़े थे उन्हें इस शहर तक पहुँचने के लिए. देहाती इलाके में बरसों घुटने के बाद उन्हें ये मौका कुछ उन्ही तरीकों को आजमाने के बाद मिला था जिनके माध्यम से पुलिस प्रमुख ने अपना पद प्राप्त किया था. भारतीय प्रशासनिक सेवा का कठिन इम्तिहान उन्होंने गाँव का धुल फांकने के लिए तो नहीं पास किया था. आखिर उनका भी करियर का प्रश्न था जो पहले ही कई बरस गाँव की रेतीली पगडंडियों में जाया हो चुकी थी. मंत्रीजी को रुष्ट करना और उनके कोपभाजन का शिकार होना कैसे गवारा करते? गाड़ी उसी तरह दनदनाती निकल गयी जैसे वहां आई थी, मानो वहां कुछ भी तो नहीं हुआ था.
मंत्रीजी के घर शादी हो और शहर के सबसे प्रतिष्ठित दैनिक के संपादक महोदय वहां उपस्थित गणमान्यों में अपनी उपस्थिति दर्ज न कराएँ, ये भला कैसे संभव था? बड़ी सी चमचमाती गाड़ी अपने गंतब्य की तरफ तीव्रता से अग्रसर थी. आज उन्होंने मन में ठान रक्खा था कि चौबीस घंटे का एक फैशन चैनल का लाईसेंस इस ख़ुशी के मौके पर मंत्री जी के प्रसन्नता का लाभ उठाकर प्राप्त कर ही लेंगे. उनका चौबीस घंटे का न्यूज़ चैनल शहर में पहले से ही सभी टी.आर.पी रेंकिंग में शीर्ष पर विराजमान था . लक्ष्मी जी की कृपा उनपर इस तरह से हो रही थी मानो लक्ष्मी जी को उस शहर का पहला एड्रेस उन्ही का पता हो. फिर भी मन में लालसा थी कि कुछ सरकारी विज्ञापन और मिल जाते तो उनके और वारे न्यारे हो जाते. उसी जुगत में लीन थे जब कानो में दर्द भरी चीत्कार सुनाई पड़ी. लेकिन जिस सोच में वो तल्लीन थे उन्हें ये राग इतना बेसुरा लगा कि ड्राईवर को गाड़ी इतना तेज भागने को कहा, मानो अचानक सैकड़ो भूत उनकी गाड़ी के पीछे लग गए हों.
सदन में विरोधी दल के नेता सदन के अन्दर और बाहर जबतक मंत्री जी तथा उनकी सरकार की भूरी-भूरी आलोचना नहीं कर लेते, तबतक उनकी राजनीति और राजधर्म पूरा नहीं होता था. किसी दिन अगर कोई कमी रह जाती तो सुबह-सुबह उनका पेट साफ़ नहीं होताऔर दिन भर गैस के गोले बनते रहते थे. लेकिन ये तो थी उनकी राजधर्म की बातें जो उनकी घोषित नीति के अनुसार 'मुद्दों' पर आधारित आलोचनाएँ हुआ करती थीं. व्यक्तिगत सम्बन्ध का मामला अलग था. वो मानते थे कि आदर्श राजनीति में मुद्दों का विरोध होता हैं न कि व्यक्तियों का . इस सिद्धांत के आवरण के नीचे कुछ व्यवहारिक समस्याएं भी थीं. उनकी पार्टी को सत्ता से बाहर हुए एक ज़माना बीत चुका था. पिछले तीन चुनावों में मंत्री जी की पार्टी से उनकी पार्टी को कड़ा चुनावी जबाब मिला था. सत्ता से इतने अरसे तक दूर रहने का एक स्वाभाविक परिणाम ये हुआ कि अब सरकारी दफ्तरों में चपरासी तक इनका काम करने से कतराते थे . अपना काम करवाने के लिए उन्हें मंत्री जी की सहृदयता पर आश्रित रहना पड़ता था. ऊपर से मंत्री जी ने किसी बाजारू महिला के साथ रतिग्रस्त अवस्था में इनका स्टिंग करवा कर उस रेकॉर्डिंग को अपने गोपनीय खाते में बंद कर रक्खा था . इन महाशय की राजनितिक हिमाकत जब ज्यादा बढ़ जाती तो मंत्री जी को याद दिलाना पड़ता था, और ये महाशय होश में आ जाते थे. अब आप ही बताईये कि इनके कानों तक सड़क पर किसी दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति की चीख पुकार क्यों कर पहुंचेगी? आनन्- फानन में उनकी गाड़ी आई और फुर्र से निकल गयी. जानने की भी ज़हमत नहीं उठाई कि माजरा क्या था?
गाड़ियों का काफिला यहीं समाप्त हो गया. रात भर शादी का जश्न चलता रहा. ऊपर से हर उपस्थित व्यक्ति खुश दिखाई पड़ने का गंभीर प्रयास करता दिख रहा था और अन्दर ही अन्दर मौके तलाशता कि कब मंत्री जी की नज़र उनपर पड़े, उनकी उपस्थिति भलीभांति दर्ज हों और कैसे उनके हित सध सकें? दूसरी और घायल व्यक्ति की हालत बिगडती जा रही थी. रात भर बुरी तरह से लहूलुहान अवस्था में कराहता रहा लेकिन उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं मिला. हाँ, पौ फटने के बाद एक बैलगाड़ी वाला उधर से गुजर रहा था. चूँकि आतंकवादी हमले का अंदेशा टल चुका था, अतः अब उस मार्ग से गुजरने पर से प्रतिबन्ध को हटा लिया गया था. बैलगाड़ी वाले ने उसे उठाकर पानी पिलाया और अब अपनी बैलगाड़ी में डालकर सरकारी अस्पताल ले जा रहा है. घायल व्यक्ति अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है. और हाँ, उसने अभी-अभी अपना नाम भी बताया. उसने बताया कि लोग उसे प्रजातंत्र के नाम से पुकारते हैं.गाडी धीरे-धीरे चल रही है और प्रजातंत्र अपनी अंतिम सांसे गिन रहा है,.पता नहीं अस्पताल पहुँच कर स्वस्थ हो पायेगा फिर से या रस्ते में ही दम तोड़ देगा!!
एकाएक एक झटका सा लगा और उनकी तन्द्रा भंग हो गयी. ड्राईवर से पूछने पर पता चला कि अचानक गाड़ी के सामने कोई आ गया और उसे टक्कर लग गयी. न्यायाधीश महोदय ने फैसला सुनाया और वो भी चंद सेकंड्स में. मिनिस्टर साहब के यहाँ समय से पहुंचना ज्यादा जरुरी है.ये लोग तो बिना आवश्यकता या उद्देश्य के पैदा होतें हैं और जिंदगी भर एड़ियां रगड़-रगड़ कर जीतें हैं और अंत में ऐसे ही गुमनामी की मौत मर जातें हैं. इसे अस्पताल पहुचाने से व्यर्थ देरी होगी और वैसे भी इस जैसे जाहिल गंवार के लिए मंत्री जी को किसी भी हालत में नाराज़ नहीं किया जा सकता. गाड़ी समय नष्ट किये बिना फिर से द्रुत गति से आगे बढ़ गयी और घायल व्यक्ति की चीख-पुकार न्यायाधीश महोदय के कानों पर धीमी पड़ती चली गयीं.
इलाका सुनसान था. इक्का-दुक्का गाड़ियाँ ही उधर से गुजरने वाली थीं. चूँकि मंत्री महोदय के यहाँ शादी हो रही थी तो यातायात पुलिस का मौलिक कर्त्तव्य था कि आतंकवादी हमले का अंदेशा जता कर पुरे इलाके को आम आदमियों के लिए बंद कर दिया जाता और इस बार भी वो अपने इस मौलिक कर्त्तव्य का निर्वहन पूरी निष्ठा और ईमानदारी से कर रही थी. सन्दर्भ ये है कि उस घायल व्यक्ति क़ी चीख पुकार सुनने के लिए अगली गाड़ी का आना निहायत जरुरी था.
जल्द ही अगली गाड़ी हवा से बातें करती हुई वहां पहुंची . इस गाड़ी में शहर के पुलिस प्रधान विराजमान थे. ज्यों-ज्यों गाड़ी नजदीक आती गयी, घायल व्यक्ति क़ी दर्दनाक चीखों क़ी आवाज़ स्पष्ट सुनाई पड़ने लगी. ड्राईवर ने साहब को दुर्घटना के बारे में सूचित किया. साहब की समस्या भी वही थी. मंत्री जी का आशीर्वाद अपने पद पर बने रहने के लिए अनिवार्य था. बड़ी मुश्किल से, अथक परिश्रम और जायज-नाजायज हर तरीकों का प्रयोग कर, मंत्रीजी को प्रसन्न किया था उन्होंने और इस मलाईदार पद पर आसीन होने का सौभाग्य प्राप्त किया था. शहर में दबी जुबान ये चर्चा आम थी कि एकमुश्त एक बड़ी रकम उन्हें मंत्री जी को देना पड़ा था और साथ ही यह जुबान भी कि पूर्ण मासिक ऊपरी कमाई का एक बड़ा हिस्सा नजराने के तौर पर हर महीने मंत्री जी के किसी गोपनीय खाते में जमा कराएँगे. देरी से वहां पहुँचने का मतलब था मंत्रीजी का रुष्ट होना और उनकी पोस्टिंग दूर-दराज के किसी देहाती इलाके में होना. उन्होंने भी कुछ सेकंड्स ही लगाये और निर्णय लिया कि कोई न कोई भलमानस पीछे से आता ही होगा जो उनकी तरह 'मजबूर' नहीं होगा और शायद इस व्यक्ति की जान बच जाये. अगर वो मर भी जाता है तो कोई बड़ी बात तो होगी नहीं. बड़े-बड़े शहरों में छोटी छोटी बातें तो होती ही रहती हैं. शाहरुख़ खान के इस फ़िल्मी उक्ति को उन्होंने अपनी नैतिकता का आधार बनाया . उनके इशारे पर गाड़ी एक बार फिर हवा से बातें करने लगी और चीख-पुकार पीछे छूटता चला गया.
दनदनाती हुई आती अगली गाड़ी में जिलाधिकारी महोदय सवार थे. कहने की ज़रूरत भी नहीं शायद कि बड़े-बड़े पापड़ बेलने पड़े थे उन्हें इस शहर तक पहुँचने के लिए. देहाती इलाके में बरसों घुटने के बाद उन्हें ये मौका कुछ उन्ही तरीकों को आजमाने के बाद मिला था जिनके माध्यम से पुलिस प्रमुख ने अपना पद प्राप्त किया था. भारतीय प्रशासनिक सेवा का कठिन इम्तिहान उन्होंने गाँव का धुल फांकने के लिए तो नहीं पास किया था. आखिर उनका भी करियर का प्रश्न था जो पहले ही कई बरस गाँव की रेतीली पगडंडियों में जाया हो चुकी थी. मंत्रीजी को रुष्ट करना और उनके कोपभाजन का शिकार होना कैसे गवारा करते? गाड़ी उसी तरह दनदनाती निकल गयी जैसे वहां आई थी, मानो वहां कुछ भी तो नहीं हुआ था.
मंत्रीजी के घर शादी हो और शहर के सबसे प्रतिष्ठित दैनिक के संपादक महोदय वहां उपस्थित गणमान्यों में अपनी उपस्थिति दर्ज न कराएँ, ये भला कैसे संभव था? बड़ी सी चमचमाती गाड़ी अपने गंतब्य की तरफ तीव्रता से अग्रसर थी. आज उन्होंने मन में ठान रक्खा था कि चौबीस घंटे का एक फैशन चैनल का लाईसेंस इस ख़ुशी के मौके पर मंत्री जी के प्रसन्नता का लाभ उठाकर प्राप्त कर ही लेंगे. उनका चौबीस घंटे का न्यूज़ चैनल शहर में पहले से ही सभी टी.आर.पी रेंकिंग में शीर्ष पर विराजमान था . लक्ष्मी जी की कृपा उनपर इस तरह से हो रही थी मानो लक्ष्मी जी को उस शहर का पहला एड्रेस उन्ही का पता हो. फिर भी मन में लालसा थी कि कुछ सरकारी विज्ञापन और मिल जाते तो उनके और वारे न्यारे हो जाते. उसी जुगत में लीन थे जब कानो में दर्द भरी चीत्कार सुनाई पड़ी. लेकिन जिस सोच में वो तल्लीन थे उन्हें ये राग इतना बेसुरा लगा कि ड्राईवर को गाड़ी इतना तेज भागने को कहा, मानो अचानक सैकड़ो भूत उनकी गाड़ी के पीछे लग गए हों.
सदन में विरोधी दल के नेता सदन के अन्दर और बाहर जबतक मंत्री जी तथा उनकी सरकार की भूरी-भूरी आलोचना नहीं कर लेते, तबतक उनकी राजनीति और राजधर्म पूरा नहीं होता था. किसी दिन अगर कोई कमी रह जाती तो सुबह-सुबह उनका पेट साफ़ नहीं होताऔर दिन भर गैस के गोले बनते रहते थे. लेकिन ये तो थी उनकी राजधर्म की बातें जो उनकी घोषित नीति के अनुसार 'मुद्दों' पर आधारित आलोचनाएँ हुआ करती थीं. व्यक्तिगत सम्बन्ध का मामला अलग था. वो मानते थे कि आदर्श राजनीति में मुद्दों का विरोध होता हैं न कि व्यक्तियों का . इस सिद्धांत के आवरण के नीचे कुछ व्यवहारिक समस्याएं भी थीं. उनकी पार्टी को सत्ता से बाहर हुए एक ज़माना बीत चुका था. पिछले तीन चुनावों में मंत्री जी की पार्टी से उनकी पार्टी को कड़ा चुनावी जबाब मिला था. सत्ता से इतने अरसे तक दूर रहने का एक स्वाभाविक परिणाम ये हुआ कि अब सरकारी दफ्तरों में चपरासी तक इनका काम करने से कतराते थे . अपना काम करवाने के लिए उन्हें मंत्री जी की सहृदयता पर आश्रित रहना पड़ता था. ऊपर से मंत्री जी ने किसी बाजारू महिला के साथ रतिग्रस्त अवस्था में इनका स्टिंग करवा कर उस रेकॉर्डिंग को अपने गोपनीय खाते में बंद कर रक्खा था . इन महाशय की राजनितिक हिमाकत जब ज्यादा बढ़ जाती तो मंत्री जी को याद दिलाना पड़ता था, और ये महाशय होश में आ जाते थे. अब आप ही बताईये कि इनके कानों तक सड़क पर किसी दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति की चीख पुकार क्यों कर पहुंचेगी? आनन्- फानन में उनकी गाड़ी आई और फुर्र से निकल गयी. जानने की भी ज़हमत नहीं उठाई कि माजरा क्या था?
गाड़ियों का काफिला यहीं समाप्त हो गया. रात भर शादी का जश्न चलता रहा. ऊपर से हर उपस्थित व्यक्ति खुश दिखाई पड़ने का गंभीर प्रयास करता दिख रहा था और अन्दर ही अन्दर मौके तलाशता कि कब मंत्री जी की नज़र उनपर पड़े, उनकी उपस्थिति भलीभांति दर्ज हों और कैसे उनके हित सध सकें? दूसरी और घायल व्यक्ति की हालत बिगडती जा रही थी. रात भर बुरी तरह से लहूलुहान अवस्था में कराहता रहा लेकिन उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं मिला. हाँ, पौ फटने के बाद एक बैलगाड़ी वाला उधर से गुजर रहा था. चूँकि आतंकवादी हमले का अंदेशा टल चुका था, अतः अब उस मार्ग से गुजरने पर से प्रतिबन्ध को हटा लिया गया था. बैलगाड़ी वाले ने उसे उठाकर पानी पिलाया और अब अपनी बैलगाड़ी में डालकर सरकारी अस्पताल ले जा रहा है. घायल व्यक्ति अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है. और हाँ, उसने अभी-अभी अपना नाम भी बताया. उसने बताया कि लोग उसे प्रजातंत्र के नाम से पुकारते हैं.गाडी धीरे-धीरे चल रही है और प्रजातंत्र अपनी अंतिम सांसे गिन रहा है,.पता नहीं अस्पताल पहुँच कर स्वस्थ हो पायेगा फिर से या रस्ते में ही दम तोड़ देगा!!
Sad.........this is india
ReplyDeletefeeling sad....but why this open ended scheme..??
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