Sunday, February 27, 2011

Pushp Ki Abhilasha (Samprati) !!

हिंदी साहित्य की समृद्धि में अपना अंशदान करने वाले अनेकोनेक मूर्धन्य विभूतियों में कविवर माखन लाल चतुर्वेदी का नाम अग्रिम सूचि में शामिल है. शब्दों की लयात्मक माला का सुघड़ स्वरुप और ओजस्वी वीर रस युक्त देश प्रेम की अविरल धारा का जो प्रवाह उनकी अत्यधिक प्रसिद्ध रचना पुष्प की अभिलाषा  में दिखाई पड़ता है वह उपरोक्त सन्दर्भ में उनके नाम की सार्थकता को स्वतः प्रमाणित करता है. पुष्प में अन्तर्निहित सौंदर्य बोध के मोह- पाश में न उलझकर उसकी उपयोगिता के भाव पक्षों में तात्कालिक  मानवीय मूल्यांकन की दृष्टि से श्रेष्ठ, देश-प्रेम के भाव को शीर्षता प्रदान कर उन्होंने अपनी कविता को अति उच्च धरातल पर प्रस्तुत किया है. कवि की वैचारिक निष्ठा और देश प्रेम के प्रति ईमानदारी के सम्प्रेषण का माध्यम पुष्प बन जाता है जो अन्यथा इन भावों से स्वतः पूर्ण रूप से मुक्त है. कवि की अपनी मातृभूमि के प्रति प्रेम और प्रतिबद्धता पुष्प को अभिभूत करता है कि वह कवि के भावों का संवहन करे तथा इस प्रक्रिया में वह स्वयं मानवीय स्वरुप धारण कर लेता है. माना जा सकता है कि वह दौर ही कुछ ऐसा था जब देशप्रेम एक पूर्णकालिक पेशा था और मानवीय जीवन की सभी भौतिक वरीयताओं, चिंताओं और जुगतों से इतर सदैव अपनी प्राथमिकता और अनिवार्यता तात्कालिक मानसिक पटल पर बनाये रखता था. मानवीय भावनाओं के प्रतीकात्मक चित्रण की सरलता, सहजता और सुन्दरता का घनिष्ट सम्बन्ध निश्चित रूप से वैचारिक एकात्मकता के साथ प्रत्यक्ष रूप से सामंजस्य और तारतम्यता स्थापित कर पाने की उस पीढ़ी की सफलता में निहित है.
                                                  सम्प्रति, मानवीय संवेदनाएं तथा उनका गद्यात्मक अथवा पद्यात्मक सम्प्रेषण की यात्रा  अबाध गति से आगे बढ़ रही है और नित नए मंजिल तलाश रही है. बदलते परिवेश में शायद पुष्प की अभिलाषाएं भी बदल रही हैं. वरीयता क्रम में आज किसी सजनी के सौंदर्य वृद्धि में शामिल होना सर्वोपरि हो. उदारीकरण और बाजारवाद के इस दौर में सजनी का स्वरुप भी उदात्त, उदार और बाजारू हो गया है.आज सजनी पत्र-पत्रिकाओं और दूर संचार के सभी माध्यमों में बार बार तथा दिन प्रति दिन इतनी बार अपनी उदारीकृत स्वरुप में अवतरित होती हैं कि अगरबत्ती से लेकर तम्बाकू तक का सेवन करने वाले लोगों के मनह-पटल पर अमिट रूप से बसी होती हैं. ज़ाहिर है, सजनी कि मांग बढ़ी है इस दौर में: उठते- बैठते,सोते-जागते सजनी की भाव-भंगिमाओं के दर्शन कराये और किये जाते हैं. घर में अपनी सजनी अगर हो भी तब भी
 परायी सजनी के सौंदर्य का बाजारी स्वरुप का खुले तौर पर चक्षु- पान करने के अवसर बगैर कोई परिश्रम के   मिलता रहे तो कोई भी "चौहान" क्यूँ चूकेगा? बाजार सजी है कवियों की भी तथा बेचनी है अपनी कविताओं को तो अपनी कविताओं में पुष्पों की माला गूंधते  समय सजनी और उसके वैश्विक बाजार को आज का कवि कैसे नज़रंदाज़ कर सकता है? आज सजनी के जिस '' सौंदर्य- पुराण'' की रचना वह करता है, उसकी पुष्प  की अभिलाषा उसी पुराण में गुंधे जाने की होती है. सजनी की सुन्दरता को प्रतीकात्मक रूप से चित्रित करने के उद्यम में पुष्प से बेहतर और कोई प्रतीक हो भी नहीं सकता.
                                                         रही बात उस पथ पर फेंक दिए जाने की जिस रास्ते पर मातरी -भूमि पर अपना जीवन उत्सर्ग करने वीर जाते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि आज के इस दौर में न तो ऐसा कोई पथ दिखाई पड़ता है, और  न ही ऐसा कोई जुनूनी वीर!! अब तो पुष्प वनों में कम और पूंजीवादी बगीचों में ज्यादा खिलते हैं. वनमाली भी कहाँ नज़र आतें हैं? हाँ, पुष्प की भौतिक मूर्त सुन्दरता का मौद्रिक नीलामी लगाने वाले फ्लोरिस्ट नज़र आते हैं सभी पूंजीवादी चौराहों और नुक्कड़ों पर. आर्थिक उदारीकरण ने राष्ट्र की दहलीज़ को लांघ कर सम्पूर्ण विश्व को एक वैश्विक गाँव में परिवर्तित  करने का बीड़ा उठा रक्खा  है तो प्रेम भी राष्ट्र की सीमा को लांघ कर उस एक वैश्विक गाँव के प्रति होना स्वाभाविक हो गया है.
                                                         अतएव, चतुर्वेदी जी, आपकी सोच और आपका देशप्रेम हमारे इतिहास औरसाहित्य की परम्पराओं में स्वर्णिम अक्षरों में उत्कीर्ण हैं. किन्तु, उनकी प्रासंगिकता इस दौर में बदल चुके परिवेश की वजह से शून्य हो चुकी है.हमने ये मान लिया है कि हमें राष्ट्र-प्रेम के आपके दौर के उन्माद तथा जुनून कि आवश्यकता अंग्रेजों से सिर्फ अपनी राजनीतिक आज़ादी प्राप्त करने के लिए थी.सो हमने प्राप्त कर ली. अब तो स्वशासन है.पुष्प की कीमतें आसमान छूतीं  हैं, वनमाली भी नज़र नहीं आता, स्वशासन में जीवन का बलिदान भी किसके विरोध में करें. कुल मिलाकर, अब पुष्प कि वर्तमान अभिलाषा यही प्रतीत होती  है कि वह बाजारी सजनी की  अंगिका बनी रहे!!!                                                  संजय सिंह.                                                                                      

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